मिर्ज़ा ग़ालिब की मशहूर शायरियां, शेर व गज़ल….

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Ghalib ki Shayari in hindi fonts

हम कहाँ के दाना थे किस हुनर में यकता थे
बे-सबब* हुआ ‘ग़ालिब’ दुश्मन आसमाँ अपना

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निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले

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हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है

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रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं

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इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

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पहले आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती

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हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होते तक

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आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे

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हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

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पिला दे ओक से साक़ी जो मुझ से नफ़रत है
पियाला गर नहीं देता न दे शराब तो दे

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हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है

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तुम सलामत रहो हज़ार बरस
हर बरस के हों दिन पचास हज़ार

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हवस को है नशात-ए-कार क्या क्या
न हो मरना तो जीने का मज़ा क्या

Galib Ki Shayari

क़ासिद के आते आते ख़त इक और लिख रखूँ
मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में

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आए है बे-कसी-ए-इश्क़ पे रोना ‘ग़ालिब’
किस के घर जाएगा सैलाब-ए-बला मेरे बाद

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दाइम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं
ख़ाक ऐसी ज़िंदगी पे कि पत्थर नहीं हूँ मैं

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इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के

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उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

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इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

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आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

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इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतश ‘ग़ालिब’
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने

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वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं

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जब तवक़्क़ो ही उठ गई ‘ग़ालिब’
क्यूँ किसी का गिला करे कोई

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दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

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जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है

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यही है आज़माना तो सताना किस को कहते हैं
अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तिहाँ क्यूँ हो

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जी ढूँडता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए

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