शंकराचार्य जयंती 2018- आदि शंकराचार्य जिन्होंने हिन्दू धर्म की दो एक नई पहचान

0
238
Adi Shankaracahrya Biography Jayanti in Hindi

Adi Shankaracahrya Biography Jayanti in Hindi – वैसाख मास का हिन्दू धर्म में बहुत ही महत्व होता हैं जिसमें कई महान व्यक्तियों ने जन्म लिया ईसी कड़ी में हिंदू धर्म की ध्वजा को देश के चारों कोनों तक पहचाने वाले, अद्वैत वेदांत के मत को शास्त्रार्थ द्वारा देश के प्रत्येक कोने में सिद्ध करने वाले, भगवान शिव के अवतार माने जाने वाले आदि शंकराचार्य ने जन्म लिया था। शंकराचार्य एक महान दिन्दू दार्शनिक एवं धर्मगुरू थे। आइये जानते हैं शंकराचार्य के जीवन के बारे में विस्तार से-

इसे भी पढ़ेंभगवान परशुराम के जन्म  से जुड़ी कहानी व रोचक बातें

शंकराचार्य जंयती 2018 –Shankaracahrya Jayanti 2018 Dates

वर्ष 2018 में शंकराचार्य जयंती 20 अप्रैल को मनायी जा रही हैं.

आदि शंकराचार्य का जीवन परिचय – (Adi Shankaracharya Biography in hindi)

नामआदि शंकराचार्य
जन्म820 ई, केलर के कलादी ग्राम में
मृत्यु820 ई.
पिताश्री शिवागुरू
माताश्रीमती आर्याम्बा
धर्महिन्दू
जातिब्राह्मण
गुरूगोविंदाभागवात्पद
प्रमुख उपन्यासअद्वैत वेदांत

 

आदि शंकराचार्य का संक्षिप्त जीवन परिचय-Brief life introduction of Adi Shankaracharya

आदि शंकराचार्य जी का जन्म 788 ई0 पू0 माना जाता है. केलर का कालड़ी जो उस वक्त मालाबार प्रांत में होता था नामक स्थान पर एक नंबूदरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। आदि शंकराचार्य के जन्म को लेकर एक कथा प्रचलित हैं- वैशाख शुक्ल पंचमी के दिन दक्षिण के कालाड़ी ग्राम में शिवगुरू नाम के एक ब्राह्मण निवास करते थे, विवाहोपरांत उनके कई साल तक किसी भी संतान की प्राप्ति नहीं हुई. इसके बाद शिवगुरू ने पत्नी विशिष्टादेवी के साथ संतान प्राप्ति हेतु भगवान शंकर की आराधना की. इनके कठिन तप से प्रसन्न होकर महादेव ने स्वप्न में दर्शन दिये और वरदान मांगने के लिए कहा.

तव शिवगुरू नें भगवान शिव से एक ऐसी संतान की प्राप्ति की कामना की जो दीर्घायु भी हो और जिसकी ख्याति विश्वभर में बने. तब शिवजी नें कहा कि की या तो तुम्हारी संतान दीर्घायु हो सकती हैं या फिर सर्वज्ञ , जो दीर्घायु होगा वह सर्वज्ञ नहीं होगा और जो सर्वज्ञ होगा वह दीर्घायु नहीं होगा। तब शिवगुरू नें दीर्घायु की बजाय सर्वज्ञ की की कामना की. मान्यता हैं कि शिवजी नें इसके बाद स्वंय शिवगुरू की संतान के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया.

इसके बाद समय आने पर शिवगुरु और विशिष्टादेवी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। भगवान शंकर की तपस्या के प्रताप इस बालक का नाम भी माता-पिता ने शंकर रखा। कहते हैं पूत के पांव पलने में ही नज़र आने लगते हैं फिर वे तो स्वयं भगवान शंकर का वरदान थे अत: शैशव काल में ही यह संकेत तो माता-पिता को दिखाई देने लगे थे कि यह बालक तेजस्वी है, सामान्य बालकों की तरह नहीं है। हालांकि शैशवकाल में ही पिता शिवगुरु का साया सर से उठ गया।

 बालक शंकर ने भी माता की आज्ञा से वैराग्य का रास्ता अपनाया और सत्य की खोज में चल पड़े। मान्यता है कि मात्र सात वर्ष की आयु में उन्हें वेदों का संपूर्ण ज्ञान हो गया था। बारह वर्ष की आयु तक आते-आते वे शास्त्रों के ज्ञाता हो चुके थे। सोलह वर्ष की अवस्था में तो आप ब्रह्मसूत्र भाष्य सहित सौ से भी अधिक ग्रंथों की रचना कर चुके थे। इस आप शिष्यों को भी शिक्षित करने लगे थे। इसी कारण आपको आदि गुरु शंकाराचार्य के रूप में भी प्रसिद्धि मिली।

शंकराचार्य की मृत्यु- जैसा की भगवान शिवजी का वरदान था कि वह सर्वज्ञ तो होंगे लेकिन दीर्घायु नहीं होगें, उनके वर के मुताविक ही आदि शंकराचार्य की ख्याति पूरे भारत में हुआ लेकिन आदि शंकराचार्य 820 ई0 में पंचतत्व में विलीन हो गय़े. यानि वह केवल 32 वर्ष ही ही जीवित रहे.

शंकराचार्य पीठों की स्थापना (SHANKARACHARAY PEETH)

आदि शंकराचार्य द्वारा देश के चारों कौनों में अद्वैत वेदांत मत का प्रचार करने के साथ ही आपने पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों दिशाओं में मठों की स्थापना की इन्हें पीठ भी कहा जाता है।

वेदांत मठ  दक्षिण भारत में आपने वेदांत मठ की स्थापना श्रंगेरी (रामेश्वरम) में की। यह आप द्वारा स्थापित प्रथम मठ था इसे ज्ञानमठ भी कहा जाता है।

गोवर्धन मठ  इसे आपने पूर्वी भारत (जगन्नाथपुरी) में स्थापित किया। यह आदि शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित दूसरा मठ था।

शारदा मठ  पश्चिम भारत (द्वारकापुरी) में आपने तीसरे मठ की स्थापना की इसे कलिका मठ भी कहा जाता है।

बद्रीकाश्रम  इसे ज्योतिपीठ मठ कहा जाता है। यह आप द्वारा उत्तर भारत में स्थापित किया गया।

इस प्रकार चारों दिशाओं में मठों की स्थापना कर आपने धर्म का प्रचार पूरे देश में किया। आप जहां भी जाते वहां शास्त्रार्थ कर लोगों को उचित दृष्टांतों के माध्यम से तर्कपूर्ण विचार प्रकट कर अपने विचारों को सिद्ध करते। आपने तत्कालीन विद्वान मिथिला के मंडन मिश्र को शास्त्रार्थ में पराजित किया लेकिन कहा जाता है कि मण्डन मिश्र की पत्नी भारती ने आपको शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया। आपने पुन: रतिज्ञान प्राप्त किया और तत्पश्चात उन्हें भी शास्त्रार्थ में पराजित किया।

आदि शंकराचार्य जयंती महत्व | Significance of Adi Shankaracharya Jayanti

आदि शंकराचार्य जयन्ती के दिन शंकराचार्य मठों में पूजन हवन किया जाता है और पूरे देश में सनातन धर्म के महत्व पर विशेष कार्यक्रम किए जाते हैं. मान्यता है कि आदि शंकराचार्य जंयती के अवसर पर अद्वैत सिद्धांत का किया जाता है.

इस अवसर पर देश भर में शोभायात्राएं निकली जाती हैं तथा जयन्ती महोत्सव होता है जिसमें बडी संख्या में श्रद्वालु भाग लेते हैं तथा यात्रा करते समय रास्ते भर गुरु वन्दना और भजन-कीर्तनों का दौर रहता है. इस अवसर पर अनेक समारोह आयोजित किए जाते हैं जिसमें वैदिक विद्वानों द्वारा वेदों का सस्वर गान प्रस्तुत किया जाता है और समारोह में शंकराचार्य विरचित गुरु अष्टक का पाठ भी किया जाता है.

प्रमुख ग्रंथ-

आदि शंकराचार्य जी नें हिन्दी, संस्कृत का प्रयोग करते हुए करीब 10 से ज्यादा उपनिषदों, कई शास्त्रों, गीता पर संस्करण और कई उपदेशों को, लिखित व मौखिक लोगों तक पहुंचाया.

इसे पढ़ें- बल्लभाचार्य जयंती व जीवन परिचय

आदि शंकराचार्य के अनमोल विचार

1- मंदिर वही पहुंचता है जो धन्यवाद देने जाता हैं, मांगने नहीं।

2- मोह से भरा हुआ इंसान एक सपने कि तरह हैं, यह तब तक ही सच लगता है जब तक आप अज्ञान की नींद में सो रहे होते है।  जब नींद खुलती है तो इसकी कोई सत्ता नही रह जाती है।

3-  जिस तरह एक प्रज्वलित दिपक कॉ चमकने के लीए दूसरे दीपक की ज़रुरत नहीं होती है।  उसी तरह आत्मा जो खुद ज्ञान स्वरूप है उसे और क़िसी ज्ञान कि आवश्यकता नही होती है, अपने खुद के ज्ञान के लिए।

4- आत्मसंयम क्या है ? आंखो को दुनियावी चीज़ों कि ओर आकर्षित न होने देना और बाहरी ताकतों को खुद से दूर रखना।

5- सत्य की कोई भाषा नहीं है।  भाषा सिर्फ मनुष्य का निर्माण है। लेकिन सत्य मनुष्य का निर्माण नहीं, आविष्कार है। सत्य को बनाना या प्रमाणित नहिं करना पड़ता, सिर्फ़ उघाड़ना पड़ता है।

6- सत्य की परिभाषा क्या है ? सत्य की इतनी ही परिभाषा है की जो सदा था, जो सदा है और जो सदा रहेगा।

7- तीर्थ करने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है।  सबसे अच्छा और बड़ा तीर्थ आपका अपना मन है, जिसे विशेष रूप से शुद्ध किया गया हो।

8- जब मन में सच जानने की जिज्ञासा पैदा हो जाए तो दुनियावी चीज़े अर्थहीन लगती हैं।

9- हर व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि आत्मा एक राज़ा की समान होती है जो शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धि से बिल्कुल अलग होती है। आत्मा इन सबका साक्षी स्वरुप है।

10- अज्ञान के कारण आत्मा सीमित लगती है,  लेकिन जब अज्ञान का अंधेरा मिट जाता है, तब आत्मा के वास्तविक स्वरुप का ज्ञान हो जाता है, जैसे बादलों के हट जाने पर सूर्य दिखाई देने लगता है।

11- धर्म की किताबे पढ़ने का उस वक़्त तक कोई मतलब नहीं, जब तक आप सच का पता न लगा पाए।  उसी तरह से अगर आप सच जानते है तो धर्मग्रंथ पढ़ने कि कोइ जरूरत नहीं हैं।  सत्य की राह पर चले।

12- आनंद तभी मिलता  आनंद कि तालाश नही कर रहे होते है।

13- एक सच यह भी है की लोग आपको उसी वक़्त ताक याद करते है जैब ताक सांसें चलती हैं।  सांसों के रुकते ही सबसे क़रीबी रिश्तेदार, दोस्त, यहां तक की पत्नी भी दूर चली जाती है।

—- साल भर पड़ने वाले समस्त त्यौहारो का विवरण विस्तार से—–

इसे भी पढ़ें-

REGISTER करें और पायें प्रत्येक Educational and Interesting Post, अपने EMail पर।

loading...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here