कामाख्या मंदिर से जुड़ी कहानी व इतिहास

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kamakhya devi story

कामाख्या मंदिर असम की राजधानी दिसपुर के पास गुवाहाटी से 8 किलोमीटर नीलांचल पर्वत पर स्थित है। यह मंदिर शक्ति की देवी सती का मंदिर है। यह मंदिर एक पहाड़ी पर बना है व इसका महत् तांत्रिक महत्व है। माता सती के प्रति भगवान शिव का मोह भंग करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर के 51 भीग किए थे. जिस-जिस जगह पर माता सती के शरीर के अंग गिरे, वे शक्तिपीठ कहलाए. माता के इन्ही सभी शक्तिपीठों में से कामाख्या शक्तिपीठ को सर्वोत्तम माना जाता है। इस मंदिर में आपको मुख्य देवी कामाख्या के अलावा देवी काली के अन्य 10 रूप जैसे धूमावती, मतंगी, बगोला, तारा, कमला, भैरवी, चिनमासा, भुवनेश्वरी और त्रिपुरा सुन्दरी देखने मिलेंगे। इन मे से त्रिपुरा सुन्दरी, मातंगी और कमला मुख्य मंदिर में है और बाकी सातों अलग-अलग मंदिर में है। यह हिंदुओ का मुख्य धार्मिक स्थल है और खास तौर पे साधुओ के लिये। कहा जाता है यहां देवी का योनि भाग होने की वजह से यहां माता रजस्वला होती हैं.

कामाख्या मंदिर का रोचक इतिहास –

मान्यताओं के अनुसार, कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में कामरूप प्रदेश के राज्यों में युद्ध होने लगे, जिसमें कूचविहार रियासत के राजा विश्वसिंह जीत गए। युद्ध में विश्व सिंह के भाई खो गए थे और अपने भाई को ढूंढने के लिए वे घूमत-घूमते नीलांचल पर्वत पर पहुंच गए। वहां पर उन्हें एक वृद्ध महिला दिखाई दी। उस महिला ने राजा को इस जगह के महत्व और यहां कामाख्या पीठ होने के बारे में बताया। यह बात जानकर राजा ने इस जगह की खुदाई शुरु करवाई। खुदाई करने पर कामदेव का बनवाए हुए मूल मंदिर का निचला हिस्सा बाहर निकला। राजा ने उसी मंदिर के ऊपर नया मंदिर बनवाया। कहा जाता है कि 1564 में मुस्लिम आक्रमणकारियों ने मंदिर को तोड़ दिया था। जिसका कूच बिहार के राजा नर नारायण ने 1665 ईस्‍वी में दोबारा निर्माण कराया था। इस पर विदेशी आक्रमणकारियों ने हमला कर इसे जबरदस्‍त नुकसान पहुंचा दिया था। इस मंदिर में सात अण्‍डाकार एस्‍क्‍वायर हैं। इनमें से प्रत्‍येक पर तीन सोने के मटके लगे हुए हैं। इसका प्रवेश द्वारा सर्पिलाकार है जो एक घुमावदार रास्‍ते से थोड़ी दूर पर खुलता है। यह विशेष रूप से मुख्‍य सड़क को मंदिर से जोड़ता है।

मंदिर के शिल्‍पकला से बनाए गए कुछ पैनलों पर प्रसन्‍नता की स्थिति में कुछ हिन्‍दु देवी और देवताओं के चित्र हैं। कच्‍छुए, बंदर और बड़ी संख्‍या में कबूतरों ने इस मंदिर को अपना घर बनाया हुआ है। मंदिर का शांत और कलात्‍मक वातावरण दर्शकों के मन को एक अनोखी शांति से भर देता है। भक्‍तों के मन में एक सात्विक भावना उत्‍पन्‍न होती है।

इसकी रहस्‍यमय भव्‍यता और देखने योग्‍य स्‍थान के साथ कामाख्‍या मंदिर न केवल असम बल्कि पूरे भारत का चकित कर देने वाला मंदिर है। वैसे भी कामाख्या मंदिर अपनी भौगोलिक विशेषताओं के कारण बेहतर पर्यटन स्थल है। यहां साल भर लोगों का आना-जाना लगा रहता है।

कैसे पहुंचे कामाख्‍या मंदिर

यह मंदिर गुवाहाटी रेलवे स्‍टेशन से कुछ किलो मीटर की दूरी पर है। यह पूरे साल भक्‍तों के लिए खुला रहता है। हवाई हजाज या रेलगाड़ी से देश के किसी भी हिस्‍से से गुवाहाटी पहुंचा जा सकता है, जहां से टैक्‍सी लेकर मां के दर्शन के लिए जाया जा सकता है। यहां रहने के लिए बजट होटल से सितारा होटल तक की अच्‍छी व्‍यवस्‍था है।

पौराणिक कहानी –

पौराणिक सत्य है कि अम्बूवाची पर्व के दौरान माँ भगवती रजस्वला होती हैं और मां भगवती की गर्भ गृह स्थित महामुद्रा (योनि-तीर्थ) से निरंतर तीन दिनों तक जल-प्रवाह के स्थान से रक्त प्रवाहित होता है। यह अपने आप में, इस कलिकाल में एक अद्भुत आश्चर्य का विलक्षण नजारा है। कामाख्या तंत्र के अनुसार –

योनि मात्र शरीराय कुंजवासिनि कामदा।
रजोस्वला महातेजा कामाक्षी ध्येताम सदा॥

इस बारे में `राजराजेश्वरी कामाख्या रहस्य’ एवं `दस महाविद्याओं’ नामक ग्रंथ के रचयिता एवं मां कामाख्या के अनन्य भक्त ज्योतिषी एवं वास्तु विशेषज्ञ डॉ॰ दिवाकर शर्मा ने बताया कि अम्बूवाची योग पर्व के दौरान मां भगवती के गर्भगृह के कपाट स्वत ही बंद हो जाते हैं और उनका दर्शन भी निषेध हो जाता है। इस पर्व की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पूरे विश्व से इस पर्व में तंत्र-मंत्र-यंत्र साधना हेतु सभी प्रकार की सिद्धियाँ एवं मंत्रों के पुरश्चरण हेतु उच्च कोटियों के तांत्रिकों-मांत्रिकों, अघोरियों का बड़ा जमघट लगा रहता है। तीन दिनों के उपरांत मां भगवती की रजस्वला समाप्ति पर उनकी विशेष पूजा एवं साधना की जाती है।

कामाख्या मंदिर अम्बुबाची पर्व  –

इस मंदिर में प्रतिवर्ष अम्बुबाची मेले का आयोजन किया जाता है।  विश्व के सभी तांत्रिकों, मांत्रिकों एवं सिद्ध-पुरुषों के लिये वर्ष में एक बार पड़ने वाला अम्बूवाची योग पर्व वस्तुत एक वरदान है। इसमें देश भर के साधु और तांत्रिक हिस्‍सा लेते हैं। शक्ति के ये साधक नीलाचल पहाड़ की विभिन्न गुफाओं में बैठकर साधना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि ‘अंबुवासी मेले’ के दौरान माँ कामाख्या रजस्वला होती हैं। अंबुवासी मेले को असम की कृषि व्यवस्था से भी जोड़कर देखा जाता है। किसान पृथ्वी के ऋतुवती होने के बाद ही धान की खेती आरंभ करते हैं। इन तीन दिन में योनि कुंड से जल प्रवाह कि जगह रक्त प्रवाह होता है। अम्बुबाची मेले को कामरूपों का कुंभ कहा जाता है।

भैरव के दर्शन के बिना अधूरी है कामाख्या की यात्रा

कामाख्या मंदिर से कुछ दूरी पर उमानंद भैरव का मंदिर है, उमानंद भैरव ही इस शक्तिपीठ के भैरव हैं। यह मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के बीच में है। कहा जाता है कि इनके दर्शन के बिना कामाख्या देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है। कामाख्या मंदिर की यात्रा को पूरा करने के लिए और अपनी सारी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए कामाख्या देवी के बाद उमानंद भैरव के दर्शन करना अनिर्वाय है।

मां कामाख्या देवी की रोजाना पूजा के अलावा भी साल में कई बार कुछ विशेष पूजा का आयोजन होता है।

  • दुर्गा पूजा: –  हर साल सितम्बर-अक्टूबर के महीने में नवरात्रि के दौरान इस पूजा का आयोजन किया जाता है।
  • अम्बुबाची पूजा: – ऐसी मान्यता है किअम्बुबाची पर्व के दौरान माँ कामाख्या रजस्वला होती है इसलिए  तीन दिन के लिए मंदिर बंद कर दिया जाता है। चौथे दिन जब मंदिर खुलता है तो इस दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
  • पोहन बिया: –  पूसा मास के दौरान भगवान कमेस्शवरा और कामेशवरी की बीच प्रतीकात्मक शादी के रूप में यह पूजा की जाती है
  • दुर्गाडियूल पूजा: –  फाल्गुन के महीने में यह पूजा कामाख्या में की जाती है।
  • वसंती पूजा: –  यह पूजा चैत्र के महीने में कामाख्या मंदिर में आयोजित की जाती है।
  • मडानडियूल पूजा: –  चेत्र महीने में भगवान कामदेव और कामेश्वरा के लिए यह विशेष पूजा की जाती है।
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