वर्तमान में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त कौन है और उनका क्या कार्य होता है।

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वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त कौन है
वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त कौन है

क्या आप जानते है कि वर्तमान में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त कौन है 2022? भारत में चुनाव प्रक्रिया करवाने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त का संवैधानिक पद भी होता है। मुख्य चुनाव आयुक्त वर्तमान में 2022 में कौन है आइए जाने और चुनाव प्रक्रिया कैसे होती इसके बारे में इस आर्टिकल में विस्तार से हम बताने जा रहे हैं। वर्तमान में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त कौन है? तो आपको बता दें इस समय भारत के मुख्य चुनाव आयोग के चीफ आफ इलेक्शन कमिशनर सुशील चंद्रा जी है।

वर्तमान में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त कौन है?

 मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा

  • सन् 2022 चीफ इलेक्शन कमिश्नर वर्तमान में सुशील चंद्रा है।  इस पद में आने से पहले  सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज (सीबीडीटी) के अध्यक्ष रह चुके हैं।
  • सुशील चंद्रा जी आइआइटी स्नातक और भारतीय राजस्व सेवा (आयकर कैडर) के 1980 बैच के  ऑफिसर  हैं।
  • इससे पहले भी आयकर विभाग के विभिन्न पदों पर रह चुके हैं।  सुशील चंद्रा जी ने रुड़की विश्वविद्यालय से  बीटेक किया और उसके बाद देहरादून से एलएलबी भी किया। 
  • इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया जिस का हिंदी में अर्थ होता है भारतीय निर्वाचन आयोग।

चुनाव आयोग के कार्य क्या होते है (Election C Commission work)

भारतीय निर्वाचन आयोग यानी इलेक्शन कमीशन (EC) का काम होता है।  लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, विधान परिषद, राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति के चुनाव करवाते हैं। चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संस्था इस पर किसी का दबाव नहीं होता है। शांति पूर्वक निष्पक्ष चुनाव कराने का दायित्व चुनाव आयोग पर ही होता है। भारतीय चुनाव आयोग राज्य और केंद्र दोनों में प्रभावशाली तरीके से स्वतंत्र होकर काम करती है। चुनाव आयोग का मुख्यालय दिल्ली में है और यहां  मुख्य चुनाव आयुक्त बैठते हैं जबकि अन्य राज्यों में उप चुनाव आयुक्त की नियुक्ति होती है। राज्य और संघ क्षेत्र में उप चुनाव आयुक्त वहां की चुनाव प्रणाली व्यवस्था को देखता है और सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त के प्रति जिम्मेदार होते हैं।

चुनाव आयोग के पास पावर / अधिकार

चुनाव की घोषणा होने का काम चुनाव आयोग करता है। चुनाव का टाइम टेबल जारी होने के बाद चुनाव आयोग सुरक्षा बल और राज्य की पुलिस को अपने अधीन कर लेता है, इसके अलावा राज्य और केंद्र कर्मचारियों की ड्यूटी मतदान केंद्रों में निष्पक्ष चुनाव करवाने के लिए उनसे मदद ली जाती है। यदि कोई पार्टी या कैंडिडेट इन नियमों का उल्लंघन करता है तो चुनाव आयोग उसे दंडित भी कर सकता है। चुनाव प्रचार के समय और संवैधानिक भाषा का प्रयोग करने वाले कैंडिडेट के खिलाफ कार्रवाई भी कर सकता है। कितनी बार दिल्ली चुनाव में इस तरह की कई घटनाओं पर चुनाव आयोग ने सख्त फैसले लिए थे।

चुनाव आयोग की ही तरह सुप्रीम कोर्ट, केंद्रीय लोकसेवा आयोग (यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन), कैग संस्थाएं स्वतंत्र रूप से काम करती हैं इन पर किसी का दबाव नहीं होता है।

चुनाव आयोग (Election Commission) क्या है?

इलेक्शन कमीशन इस का फुल फॉर्म होता है। (Election commission) जाबी एक स्वतंत्र संस्था है भारत के संविधान के आर्टिकल 324 से के तहत चुनाव कराने की प्रक्रिया की जिम्मेदारी इलेक्शन कमीशन को दिया गया है।

 एक नजर इलेक्शन कमिशन

  • इलेक्शन कमिशन की स्थापना 26 जनवरी 1950 को हुआ था। इसमें निम्नलिखित बदलाव समय-समय पर हुआ है-
  • 1950 से 1989 तक इलेक्शन सिस्टम में चीफ इलेक्शन कमिश्नर जिसे CEC कहते हैं, जो पूरा काम संभालते थे। 
  • साल 1989 से 90 तक दो इलेक्शन कमिश्नर नियुक्त किए गए थे।
  •  1990 से 1993 तक फिर सारी वर्किंग CEC के जिम्मे था।  वर्तमान समय में चीफ इलेक्शन कमिश्नर और इलेक्शन कमिशन मिलकर आयोग का जिम्मा संभाले हुए है।

इलेक्शन कमिशन राजनीतिक पार्टियों को मान्यता देते हैं

राजनीतिक पार्टियों को राज्य स्तर और केंद्र स्तर की पार्टियों के रूप में मान्यता देने का नियम और अधिकार इलेक्शन कमीशन के अधीन है वह किसी भी पार्टी को यह मानता प्राप्त करता है जो कि नियमों के आधार पर होता है।

इलेक्शन कमिशन चुनाव में हुई गड़बड़ी पर कार्रवाई करने की शक्ति भी रखता है

यदि कोई कैंडिडेट या कोई राजनीतिक पार्टी किसी तरह की इलेक्शन में गड़बड़ी करती तो उसकी शिकायत EC का C-VIGIL नाम का ऐप है, उस पर किया जा सकता है।  100 घंटे के अंदर शिकायतकर्ता को रिस्पांस दिया जाता है।

Election Commission के अधिकार और शक्तियां

चुनाव आयोग एक ऐसी संस्था है जो खुद  किसी चीज की परिभाषा दे सकती है। कहने का अर्थ है यदि चुनाव कराने में किसी तरह की समस्या होती है तो अपनी सीमा खुद तय करके नए सिरे से से तय कर सकता है। लेकिन अपनी या सीमा संविधान के दायरे में ही रखकर इलेक्शन कमीशन तय कर सकती है।  इसके अलावा  संसद और सुप्रीम कोर्ट की सहमति जरूरी होती है।

क्या कोई पार्टी या कैंडिडेट EC की बात मानने से मना भी कर सकता है?

यदि कोई कैंडिडेट या राजनीतिक पार्टी चुनाव आयोग की बातों को नहीं मानता है तो चुनाव आयोग उसके खिलाफ एक्शन के लिए फैसला ले सकता है। जहां तक अपने फैसले में वह किसी कैंडिडेट या पार्टी को चुनाव लड़ने से रोकने का फरमान भी जारी कर सकता है। इलेक्शन कमीशन के किसी भी फरमान के खिलाफ कोई राजनीतिक पार्टी या कैंडिडेट गया हुआ ऐसा मामला अभी तक नजर में नहीं आया है।

चुनाव आयोग इलेक्शन कैसे करवाता है

 भारत का चुनाव आयोग इलेक्शन कैसे करवाता है? EC इलेक्शन करवाने के लिए कौन-कौन से तरीका अपनाता है?

सबसे पहले चुनाव आयोग चुनाव की तिथि की घोषणा करता है।

 लोकसभा का चुनाव का विधानसभा का चुनाव जो आम जनता द्वारा प्रतिनिधि चुनने का चुनाव होता है।

चुनाव लड़ने के लिए इच्छुक राजनीतिक दल के कैंडिडेट या निर्दलीय कैंडिडेट को आवेदन करना होता है इसकी तिथि चुनाव आयोग द्वारा तय की जाती है जिससे आम भाषा में पर्चा भर ना कहा जाता है।

इसके बाद आवेदन को ध्यान से देखा जाता है। योग्य कैंडिडेट को चुनाव लड़ने की अनुमति चुनाव आयोग द्वारा दी जाती है लेकिन इसी बीच चुनाव से नाम वापसी करने का समय भी निर्धारित होता है।

कैंडिडेट को निर्धारित समय प्रचार करने का मौका दिया जाता है। इसके बाद किसी भी तरह की प्रचार करने की पाबंदी होती है और फिर इलेक्ट्रॉनिक मशीन द्वारा हर विधानसभा के ब्लॉक में बनाए गए मतदान केंद्रों में वोटिंग कराई जाती है।

मतगणना  के बाद सभी कैंडिडेट के हासिल किए गए वोट को देखा जाता है जो सबसे अधिक वोट पाया होता है उसे विजई घोषित किया जाता है इसके लिए चुनाव आयोग सर्टिफिकेट प्रदान करता है। 

चुनाव आयोग निष्पक्ष रुप से चुनाव कराने के लिए काम करता है। जब एक बार चुनाव हो जाता है तो चुनाव आयोग का काम खत्म हो जाता है।

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