X

महिला दिवस पर कविता । Woman’s Day Short Poems in Hindi

Advertisement
Advertisement

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2021 प्रत्येक वर्ष भांति 8 मार्च को मनाया जायेगा। महिलाओं को जागरूक करने के मकसद से यहां बहुत ही सुन्दर महिला दिवस पर कविता, Woman’s Day Short Poems in Hindi व Mahila Diwas Par Kavita लेकर आये हैं। आपको महिला दिवस नीचे शेयर की गयी कवितायें पसंद आयेंगी। इन्हे आप एक दूसरे के साथ सोशल मीडिया के माध्यम से जरूर शेयर करें। साथ ही Happy Women’s Day Wishes, Messages, Shayari in Hindi

Advertisement
को भी पढ़ें।

Women’s Day Poem in Hindi : महिला दिवस पर कविता

1- महिला दिवस कविता- फूल जैसी कोमल नारी…….

फूल जैसी कोमल नारी, कांटो जितनी कठोर नारी
अपनो की हिफासत मे सबसे अव्वल नारी
दुखो को दूर कर, खूशियो को समेठे नारी
फिर लोग क्यो कहते तेरा अत्सित्व क्या नारी
जब अपने छोटे छोटे व्खाइशो को जीने लगती  नारी
दुनिया दिखाती है उसे उसकी दायरे सारी
अपने धरम मे बन्धी नारी, अपने करम मे बन्धी नारी
अपनो की खूशी के लिये खुद के सपने करती कुुरबान नारी
जब भी सब्र का बाण टूटे तो सब पर भारी नारी
फूल जैसी कोमल नारी, कांटो जितनी कठोर नारी

इसे भी पढ़ें- महिला दिवस पर सुविचार


2. Woman’s Day Poems in Hindi- ये किसने कहा की……..

ये किसने कहा की,
नारी कमज़ोर है।
आज भी उसके हाथ में,
अपने घर को चलाने की डोर है।
वो तो दफ्तर भी जाए,
घर भी संभाले।
ऐसे हाल में भी कर दे,
पति अपने बच्चो को भी उसके हवाले।
एक बार उस नारी की ज़िंदगी जीके तो देख,
अपने मर्द होने के घमंड,
में तू बस यू बड़ी बड़ी ना फेक.।
अब हौसला बन तू उस नारी का,
जिसने ज़ुल्म सहके भी तेरा साथ दिया।
तेरी ज़िम्मेदारियों का बोझ भी,
ख़ुशी से तेरे संग बाट लिया।
चाहती तो वो भी कह देती,
मुझसे नहीं होता।
उसके ऐसे कहने पर,
फिर तू ही अपने बोझ के तले रोता।

इसे भी पढ़ें-  महिला दिवस पर बधाई संदेश मय फोटो के

3. Woman’s Day Short Poems in Hindi – मैं नारी सदियों से

मैं नारी सदियों से
स्व अस्तित्व की खोज में
फिरती हूँ मारी-मारी
कोई न मुझको माने जन
सब ने समझा व्यक्तिगत धन
जनक के घर में कन्या धन
दान दे मुझको किया अर्पण
जब जन्मी मुझको समझा कर्ज़
दानी बन अपना निभाया फर्ज़
साथ में कुछ उपहार दिए
अपने सब कर्ज़ उतार दिए
सौंप दिया किसी को जीवन
कन्या से बन गई पत्नी धन
समझा जहां पैरों की दासी
अवांछित ज्यों कोई खाना बासी
जब चाहा मुझको अपनाया
मन न माना तो ठुकराया
मेरी चाहत को भुला दिया
कांटों की सेज़ पे सुला दिया
मार दी मेरी हर चाहत
हर क्षण ही होती रही आहत
माँ बनकर जब मैनें जाना
थोडा तो खुद को पहिचाना
फिर भी बन गई मैं मातृ धन
नहीं रहा कोई खुद का जीवन
चलती रही पर पथ अनजाना
बस गुमनामी में खो जाना
कभी आई थी सीता बनकर
पछताई मृगेच्छा कर कर
लांघी क्या इक सीमा मैने
हर युग में मिले मुझको ताने
राधा बनकर मैं ही रोई
भटकी वन वन खोई खोई
कभी पांचाली बनकर रोई
पतियों ने मर्यादा खोई
दांव पे मुझको लगा दिया
अपना छोटापन दिखा दिया
मैं रोती रही चिल्लाती रही
पतिव्रता स्वयं को बताती रही
भरी सभा में बैठे पांच पति
की गई मेरी ऐसी दुर्गति
नहीं किसी का पुरुषत्व जागा
बस मुझ पर ही कलंक लागा
फिर बन आई झांसी रानी
नारी से बन गई मर्दानी
अब गीत मेरे सब गाते हैं
किस्से लिख-लिख के सुनाते हैं
मैने तो उठा लिया बीडा
पर नहीं दिखी मेरी पीडा
न देखा मैनें स्व यौवन
विधवापन में खोया बचपन
न माँ बनी मै माँ बनकर
सोई कांटों की सेज़ जाकर
हर युग ने मुझको तरसाया
भावना ने मुझे मेरी बहकाया
कभी कटु कभी मैं बेचारी
हर युग में मै भटकी नारी

हमारे द्वारा महिला दिवस पर कवितायें ऊपर शेयर की गयी हैं, उम्मीद करता हूं कि यह महिला दिवस कवितायें आपको पसंद आयी होंगी। यदि आपके पास भी कोई महिलाओं के ऊपर या अन्य कवितायें हैं तो हमारे साथ कमेंट करके जरूर शेयर करें- धन्यवाद।

Advertisement
Advertisement
Sadhana Pal: मेरा नाम साधना पाल है , मुझे देश और दुनिया के बारे में लिखना और पढ़ना अच्छा लगता हैंं. और हमेशा नया सीखने की कोशिश करती रहती हूं.
Advertisement