वरूथिनी एकादशी व्रत विधि, व्रत कथा एवं महत्व

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Varuthini Ekadashi Vrat Katha in Hindi – हिन्दु धर्म ग्रंथों में प्रत्येक एकदादशी का बहुत महत्व होता हैं। पद्म पुराण के अनुसार वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरूथिनी एकादशी ( Varuthini Ekadashi ) या वरूथिनी ग्यारस कहते हैं। हिन्दु धर्म में इस व्रत को बहुत ही शुभ माना जाता हैं।

वरूथिनी एकादशी व्रत – Varuthini Ekadashi Vrat Dates

इस वर्ष 2018 में वरूथिनी एकादशी का व्रत 11 अप्रैल दिन बुधवार को पड़ रही हैं।

वरूथिनी एकादशी व्रत विधि- Varuthini Ekadashi Vrat Vidhi in Hindi

वरूथिनी एकादशी व्रत करने वाले व्यक्ति को व्रत से एक दिन पहले यानि दसवीं के दिन इन चीजों का त्याग कर देना चाहिए- उड़द, मसूर, चना, कांस, कोदो, मधु, कास, किसी दूसरे का अन्न, दो बार भोजन एवं काम क्रिया।

इनके साथ ही एकादशी के दिन व्रती को भगवान की पूजा अर्चना एवं भजन कीर्तन आदि करना चाहिए। इसके बाद दूसरे दिन यानि द्वादसी को पूजन कर ब्राह्मण को भोजन आदि कराना चाहिए, इसके उपरांत दक्षिणा आदि देकर विदा करने के बाद स्वंय भोजन करना चाहिए। इस व्रत के दौरान व्यक्ति को सोना, पान खाना, दूसरे की बुराई करना , दातुन करना, चुगली करना, चोरी, हिंसा, काम क्रिया, झूठ आदि नहीं बोलना चाहिए।

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वरूथिनी एकादशी व्रत कथा – Varuthini Ekadashi Vrat Katha in Hindi

युधिष्ठिर ने पूछा : हे वासुदेव ! वैशाख मास के कृष्णपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? कृपया उसकी महिमा बताइये। भगवान श्रीकृष्ण बोले: राजन् ! वैशाख (कृष्णपक्ष की एकादशी ‘वरुथिनी’ के नाम से प्रसिद्ध है । यह इस लोक और परलोक में भी सौभाग्य प्रदान करनेवाली है । ‘वरुथिनी’ के व्रत से सदा सुख की प्राप्ति और पाप की हानि होती है । ‘वरुथिनी’ के व्रत से ही मान्धाता तथा धुन्धुमार आदि अन्य अनेक राजा स्वर्गलोक को प्राप्त हुए हैं । जो फल दस हजार वर्षों तक तपस्या करने के बाद मनुष्य को प्राप्त होता है, वही फल इस ‘वरुथिनी एकादशी’ का व्रत रखनेमात्र से प्राप्त हो जाता है ।

नृपश्रेष्ठ ! घोड़े के दान से हाथी का दान श्रेष्ठ है । भूमिदान उससे भी बड़ा है । भूमिदान से भी अधिक महत्त्व तिलदान का है । तिलदान से बढ़कर स्वर्णदान और स्वर्णदान से बढ़कर अन्नदान है, क्योंकि देवता, पितर तथा मनुष्यों को अन्न से ही तृप्ति होती है । विद्वान पुरुषों ने कन्यादान को भी इस दान के ही समान बताया है । कन्यादान के तुल्य ही गाय का दान है, यह साक्षात् भगवान का कथन है । इन सब दानों से भी बड़ा विद्यादान है । मनुष्य ‘वरुथिनी एकादशी’ का व्रत करके विद्यादान का भी फल प्राप्त कर लेता है । जो लोग पाप से मोहित होकर कन्या के धन से जीविका चलाते हैं, वे पुण्य का क्षय होने पर यातनामक नरक में जाते हैं । अत: सर्वथा प्रयत्न करके कन्या के धन से बचना चाहिए उसे अपने काम में नहीं लाना चाहिए । जो अपनी शक्ति के अनुसार अपनी कन्या को आभूषणों से विभूषित करके पवित्र भाव से कन्या का दान करता है, उसके पुण्य की संख्या बताने में चित्रगुप्त भी असमर्थ हैं । ‘वरुथिनी एकादशी’ करके भी मनुष्य उसीके समान फल प्राप्त करता है ।

राजन् ! रात को जागरण करके जो भगवान मधुसूदन का पूजन करते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो परम गति को प्राप्त होते हैं । अत: पापभीरु मनुष्यों को पूर्ण प्रयत्न करके इस एकादशी का व्रत करना चाहिए । यमराज से डरनेवाला मनुष्य अवश्य ‘वरुथिनी एकादशी’ का व्रत करे । राजन् ! इसके पढ़ने और सुनने से सहस्र गौदान का फल मिलता है और मनुष्य सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है ।

प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर मान्धाता नामक राजा राज्य करता था। वह अत्यंत दानशील तथा तपस्वी था। एक दिन जब वह जंगल में तपस्या कर रहा था, तभी न जाने कहाँ से एक जंगली भालू आया और राजा का पैर चबाने लगा। राजा पूर्ववत अपनी तपस्या में लीन रहा। कुछ देर बाद पैर चबाते-चबाते भालू राजा को घसीटकर पास के जंगल में ले गया। राजा बहुत घबराया, मगर तापस धर्म अनुकूल उसने क्रोध और हिंसा न करके भगवान विष्णु से प्रार्थना की, करुण भाव से भगवान विष्णु को पुकारा। उसकी पुकार सुनकर भक्तवत्सल भगवान श्री विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने चक्र से भालू को मार डाला। राजा का पैर भालू पहले ही खा चुका था। इससे राजा बहुत ही शोकाकुल हुआ। उसे दुखी देखकर भगवान विष्णु बोले- ‘हे वत्स! शोक मत करो। तुम मथुरा जाओ और वरुथिनी एकादशी का व्रत रखकर मेरी वराह अवतार मूर्ति की पूजा करो। उसके प्रभाव से पुन: सुदृढ़ अंगो वाले हो जाओगे। इस भालू ने तुम्हें जो काटा है, यह तुम्हारे पूर्व जन्म का अपराध था।’ भगवान की आज्ञा मान राजा ने मथुरा जाकर श्रद्धापूर्वक इस व्रत को किया। इसके प्रभाव से वह शीघ्र ही पुन: सुंदर और संपूर्ण अंगो वाला हो गया।

वरूथिनी एकादशी व्रत का महत्व – Importance of Varuthini Ekadashi Vrat in hindi

ऐसी मान्यता है कि इस एकादशी का फल सभी एकादशियों से बढ़ कर है। धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि अन्न दान और कन्या दान का महत्त्व हर दान से ज्यादा है और वरुथिनी एकादशी का व्रत रखने वाले को इन दोनों दानों के योग के बराबर फल प्राप्त होता है। इस दिन जो पूर्ण उपवास रखते हैं, उन्हें 10 हजार वर्षो की तपस्या के बराबर फल प्राप्त होता है। उनके सारे पाप धुल जाते हैं। जीवन सुख-सौभाग्य से भर जाता है। मनुष्य को भौतिक सुख तो प्राप्त होते ही हैं, मृत्यु के बाद उसे मोक्ष भी प्राप्त हो जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत को करने वाले सभी लोकों में श्रेष्ठ बैकुंठ लोक में जाते हैं।

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